November 18, 2017, 07:26:34 PM

Author Topic: नरसिंह प्रचंड मंत्र प्रयोग  (Read 4303 times)

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नरसिंह प्रचंड मंत्र प्रयोग
मंत्र १ : प्रचण्ड्भूतेश्वर नृसिंह शाबर मन्त्र : ll
ॐ नमो भगवते नारसिंहाय -घोर रौद्र महिषासुर रूपाय
,त्रेलोक्यडम्बराय रोद्र क्षेत्रपालाय ह्रों ह्रों
क्री क्री क्री ताडय
ताडय मोहे मोहे द्रम्भी द्रम्भी
क्षोभय क्षोभय आभि आभि साधय साधय ह्रीं
हृदये आं शक्तये प्रीतिं ललाटे बन्धय बन्धय
ह्रीं हृदये स्तम्भय स्तम्भय किलि किलि ईम
ह्रीं डाकिनिं प्रच्छादय २ शाकिनिं प्रच्छादय २ भूतं
प्रच्छादय २ प्रेतं प्रच्छादय २ ब्रंहंराक्षसं सर्व योनिम
प्रच्छादय २ राक्षसं प्रच्छादय २ सिन्हिनी पुत्रं
प्रच्छादय २ अप्रभूति अदूरि स्वाहा एते डाकिनी
ग्रहं साधय साधय शाकिनी ग्रहं साधय साधय
अनेन मन्त्रेन डाकिनी शाकिनी भूत
प्रेत पिशाचादि एकाहिक द्वयाहिक् त्र्याहिक चाथुर्थिक पञ्च
वातिक पैत्तिक श्लेष्मिक संनिपात केशरि डाकिनी
ग्रहादि मुञ्च मुञ्च स्वाहा मेरी भक्ति गुरु
की शक्ति स्फ़ुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा ll
मंत्र २ : भूत भाषन नृसिन्हमन्त्र : ॐ नमो आदेश गुरु को
,ॐ नमो जय जय नर्सिह हाथ चबाता होठ चबाता रक्त
भरा देह दौड दौड कर तीन लोक मे दुष्ट चबाता भूत प्रेत
के हाड चबाता नयन लाल लाल से आग लगाता.. जला भूत राक्षस कि
देह, देह मे लाव एन्च खेन्च के पाव के अन्गुठन से गोडा से
पिण्डी से जाण्घः से योनि से अण्ड से लिङ्ग से गुदा से
पेडु से नाभि को बचा हाथ् कन्धा गले क घण्टा हिलय हिलय के
निकाल ला कलेजे मे बेठी जात को चोट पकड के ला ..लाव
रे शेरमुखी.. जबान तक लाव बोलणे दे जो सत्य कि
वाणी भेद बताई तो सुखं पाइ… जे ना बोलवे भूत को तो सरबा
उडत आवे तेरा लङ्गोता फ़ा ड के फ़ेकेगा …बे रियन पचः पच भक्तान
प्राणं रक्ष रक्ष क्ष्रों स्वाहा देखु मेरे गुरु के शबद कि शक्ति चल
भूत बकता होय ….आदेश आदेश
मन्त्र संख्या . २ से नाक में ऊपर लिखे गए सामग्री या
घी गुग्गल से धुप दे तो भूत बोलने लगेगा जो बोलेगा सत्य
होगा साडी बात पूछ कर उसके जाने को कहे… अगर
उसकी इच्छा छोटी सी या सरल
हो तो पूरी कर के भेज दे, वापिस कभी न
आने का वचन ले कर जाने दे, अगर न माँने तो कनिस्थिका और
चोटी पकड़ कर मंत्र १ का जाप शुरू करे सरसों के तेल में
गुग्गल डाल कर धुनी लगाये नीम के पत्ते
सेंध नमक डाले… रोगी को दिखा दिखा कर सुंघा कर ५
नीम्बू १७ कील ८ पताशा
रातरानी का इत्र,५ गुलाब फूल १ कलेजी,
मधु और एक तरफ से सिकी हुइ रोटी और
थोडा घी ५२ बार उतार कर एक नयी
कची हांड़ी या मटकी में डाले…
उतारते समय मन्त्र पढ़ पढ़ कर रोगी को
पीली सरसों मारते रहे ..भुत जाने
की विनती करेगा उस से वचन ले ले
की फिर लौट के कभी न आये ..हो सके तो
उसकी मुक्ति का उपाय जान ले ..उसे हांड़ी
में आने को कह दे . भुत हांडी में आ जाये तब
हाडी थोड़ी हिल जाएगी
,हांड़ी के मुह को गंगा जल से भीगे नए
लाल कपडे से बंद कर के पीपल के पेड़ के निचे गाड कर
आ जाये ..पीछे मुड़े तो भूत वापिस आ जाएगा .
ये महा प्रयोग केवल अत्यंत घोर आत्माओ और असाद्य होने पर
ही करे, सामान्य स्थिति के लिए नहीं …
अंतिम उपाय के तौर पर काम में लेना चाहिए , पूर्ण होने पर दान प्रकृति
पुण्य कर्म करना ज़रूरी है.. तीर्थ आदि में
जाने पर उस आत्मा की मुक्ति के लिए भी
कुछ किया जाए तो आने वाले जन्मो के ऋण से भी मुक्ति
होगी,एसा फिर कभी भी
नहीं होगा… आदेश
भगवान श्री शरभेश्वर-शालुव - पक्षिराज का
चिंतामणि शाबर - मंत्र
मंत्र:—- ॐ नमो आदेश गुरु को ! चेला सुने गुरु
फ़रमाय ! सिंह दहाड़े घर में जंगल में ना जाये ,घर को फोरे ,
घर को तोरे , घर में नर को खाय !जिसने पाला उसी
का जीजा साले से घबराय ! आधा हिरना आधा घोडा
गऊ का रूप बनाय ! एकानन में दुई चुग्गा , सो
पक्षी रूप हो जाय ! चार टांग नीचे
देखूं , चार तो गगन सुहाय ! फूंक मर जल-भूंज जाय
,,काली-दुर्गा खाय ! जंघा पे बैठा यमराज
महाबली , मार के हार बनाय ! भों भों बैठे भैरू बाबा
, नाग गले लिपटाय ! एक झपट्टा मार के पक्षी ,
सिंह ले उड़ जाय ! देख देख जंगल के राजा
पक्षी से घबराय ! ”””’ॐ खें खां खं
फट प्राण ले लो , प्राण ले लो —-घर के लोग चिल्लाय !
ॐ शरभ -शालुव -पक्षिराजाय नम: !
मेरी भक्ति , गुरु की शक्ति , फुरो
मंत्र ईश्वरॊवाचा ! दुहाई महारुद्र की ! देख चेला
पक्षी का तमाशा स्वाहा ””” !!!…..
विधान/;- यह मंत्र साधारण मंत्र नहीं ! अपितु शाबर
मंत्रो में चिंतामणि मंत्र है ! मेरे परिवार की शरभ -साधना
– परम्परा में यह मंत्र क्रियात्मक रूप से प्रचलित रहा ! कुछ
समय पूर्व मेने इस मंत्र को एक प्रसिद्ध पंचांग में भी
प्रकाशित किया था —-सर्व प्रथम ! उसके पश्चात एक पत्रिका ने
इसको पंचांग से लेकर प्रकाशित कर दिया ! अब कुछ वर्षो पूर्व
ही मेने मेरी पुस्तक ”निग्रह-दारुण-
सप्तकं” में इस मंत्र को -[अन्य और भी शाबर मंत्रो
के साथ ]
प्रकाशित किया है ! ये मंत्र अत्यंत ही घोर मंत्र है !
किसी भी महापर्व में इस मंत्र का
अनुष्ठान आरम्भ करे ! श्मशान में , शिव मंदिर में , निर्जन स्थान में ,
तलघर में , शुन्यागार में ..या अपनी पूजा-कक्ष में
भी ! २१ दिन नित्य रात्रि में रुद्राक्ष की माला
पर ५ माला जप करे ! दिशा उत्तर , रक्त आसन , दीपक
प्रज्ज्वलित रहे !
चर्पटी नाथ परम्परा का अद्दभुत शाबर - मंत्र
श्री दत्त आदार्यु श्रुस्रेस्व:हुम् साबरमम अधरमम
ब्रहम निर्हरा सटी , पदम् पदाम्त्रिश
केश्वरीम ॐ भू : स्व:स्ति !!!———– इस
मंत्र को भोवल मंत्र कहते हैं ! भोवल अर्थात चक्कर आना ,,
मस्तक बधिर होना ! यह भोवल-रोग पशुओ और मनुष्य दोनों पर
ही अपना प्रभाव दिखता है ! इससे पीड़ित
प्राणी जगह जगह गोल गोल घुमने लगता है और
पागलो जेसी हरकत करने लगता है !
प्रस्तुत मंत्र स्वयं सिद्ध है ,, फिर भी
किसी महापर्व में इस मंत्र का जप अपने आराध्य-देव
के सम्मुख ..धुप-दीप प्रजव्लित करके ११ माला
की संख्या में कीजिये ! …………..
जब किसी समय इस रोग से पीड़ित
प्राणी पर इस मंत्र प्रयोग करना हो तो भस्म या शुद्ध
मिटटी अपने हाथ में लीजिये और मंत्र से
११ बार अभिमंत्रित कीजिये और रोगी पर
फेंक या उसके मस्तक पर लगा दीजिये ……मंत्र-प्रभाव
से तुरंत चमत्कार-पूर्ण लाभ होगा ! उसके पश्चात किसी
काले धागे में ११ गांठ मंत्र उचारण की साथ लगाये और
रोगी के गले में धारण करवा दे..!!! ..ये मंत्र मुझे परम्परा
से प्राप्त है … साधक जनों के लाभार्थ इसे यहाँ प्रस्तुत किया !
मंत्र शुद्ध है……..
आत्म रक्षा मंत्र एवं प्रयोग
मंत्र : तीन पैर तेरे राई मसान भूम धरती
आई धरती में से जगे जीव सांप बिच्छू
गोहेरा सर्व विद्विषो भस्म करता आवे माता पारवती
की आन है गुरु गोरखनाथ जी
की आन है सबको भस्म करता आवे माम् रक्षा कुरु
कुरुमाम रक्ष रक्ष ॐ हुम जोम सः रीम हूँ
फट !!
विधि : गोबर और कलि मिटटी से चोका बना कर उस पर
हिंगुल सिन्दूर से कालि यन्त्र बना कर सभी गुरु जन
गणेश एवं शिव जी आदि मुख्या देवताओ के ज्ञात मंत्र
5-5 पढ़े और उस पर आम की लकड़ी
बिछा दे और एक लोहे का छोटा चाकू भी रख दे …
पूर्वाभिमुख होकर अग्नि जलाये , उस अग्नि में 108 बार
घी से गुरुमंत्र की आहुति दे , फिर इस
मंत्र से 108 आहुति घी ,गूग्गुल और लाल कनेर के
फूल से दे ..
हवन के बाद अग्नि के चारो और चन्दन और उत्तम इत्र मिले जल
से चारू करे …
अग्नि शांत होने पर उसमे से चाकू निकल ले और भस्म और निर्माल्य
को बहते पानी में बहा दे। थोड़ी
सी भस्म को अपने पास रख ले / आसन कम्बल का
और तिलक चन्दन से करे …
उतने से पूर्व आसन की धुल सर पर लगा ले,धुल न हो
तो थोड़ी पहले ही रख ले …
प्रयोग : जाप आदि से पहले जहा आवश्यक हो और अन्य
कभी भी जहा भय हो तब इस चाकू से कार
कर ले …
भस्म से भय भूत आदि से ग्रस्त रोगी को खिला दे
,पानी में मिला के छिड़क दे या तिलक कर दे।।।
सभी दोष दूर होते है।।
जाप में रक्षा होती है।।।
ये अमोघ काल भैरव रक्षा विधान नागार्जुन नाथ शाबर विद्या से उद्धरित
एवं अनुभूत है
कन्या के विवाह हेतु अघोर शाबर मंत्र :
तू देख पूरब उग्ग्या सूरज देवता ॐ नमो नमः अब हम
देखा पश्चिम …मस्त चलंता मखना हाथी त्तेते सोहे
ज़र्द अम्बारी ते पर बैठी कौन
सवारी ?? ते पर बैठी पठान की
सवारी.. कोंन पठान ..कमाल खान कमाल खान मुग़ल पठान
बेठ्यो चबूतरे पढ़े कुरआन ,हज्जार काम दुनिया का करया ..एक काम
मेरो कर , न करे तो तीन लाख ३३ हज़ार पैगम्बरों
की दुहाई …तेरे को माता अन्जिनी के पूत
की दुहाई .आदेश गुरु औघड़ नाथ जी का ..
विधि : कन्या जुम्मेरात (गुरुवार) से काले हकिक या कमलगट्टे
की माला १० माला जाप मुस्लिम रीति से
(गुलाब की गंध,पश्चिमाभिमुख,सूती आसन
एकांत कक्ष ) घर के लोग तपास करे तो उत्तम रिश्ता
जल्दी से तय होगा फिर कमाल खान ,हनुमान
जी और औघड़ नाथ जी के नाम से छोटे /
अनाथ बच्चो को मिठाई रेवड़ी आदि खिलाये.
पद्मावती -मंत्र - साधन
मंत्र-:—— ”’ॐ पद्मावती
पद्मंकुशी वज्र वज्रांकुशी प्रत्यक्षं भवति
!”’ विधान:—– रात्रि के समय मिटटी के
दीपक में दीप प्रज्जवलित कर , रक्त -
कम्बल के आसन में बैठकर ,, उत्तरदिशा की और मुख
करके ,, पद्मावती का ध्यान करके सूतिका
की माला से १०००जप करे ——–२१ दिन तक !
आठवे दिन से ही मंत्र का प्रभाव अनुभूत होने लगेगा !
साधना काल में पवित्रता का विशेष ध्यान रखे और साधना विषय गुप्त
भी
अति -शीघ्र धन प्राप्ति हेतु एक अद्भुत मंत्र -विधान
मंत्र:——– ”’ग्लोड़ प्लाड़ धिन धिन सूड धेबिसन धनचर विक्रट रहा
ब्लैंड हबताये ॐ महारुद्राय नम:”” !!!
विधान:—–यह एक कापालिक मंत्र है ! श्वेत या गुलाबी
आसन पर बैठ कर , वायव्य-कोण में मुख करके , महारुद्र भगवान
शिव का ध्यान करते हुए , कमल-बीजो की
माला से ११ माला मंत्र जप करे !
जप के पश्चात् १०८ कमल बीजो को गाय के
घी में डुबाकर १०८ बार मंत्र जप करते हुए , अग्नि में
आहुति दे नित्य क्रम में ही !
समय निश्चित रखे ,, साधना -प्रयोग का !
अत: सुबह या रात्रि …किसी एक समय ही
करे ! ११ दिन तक ये विधान करते रहे ! अनुष्ठान काल के अंतर्गत
ही
आवश्यकता पूर्ति हेतु जितना धन आवश्यक है उतने धन प्राप्ति के
किसी ना किसी अज्ञात कारण-माध्यम से
योग निर्मित होने लगते हैं ! और धन प्राप्त हो जाता है ! मंत्र कुछ
अटपटी-भाषा में है ! अत: विचार ना करे !
श्री रूद्र -भैरव मंत्र- विधान
विनियोग :- अस्य श्रीरूद्र-भैरव मंत्रस्य महामाया
सहितं श्रीमन्नारायण ऋषि: ,, सदाशिव महेश्वर-
मृत्युंजय-रुद्रो-देवता ,, विराट छन्द: ,, श्रीं
ह्रीं क्ली महा महेश्वर
बीजं ,, ह्रीं गौरी शक्ति: ,, रं
ॐकारस्य दुर्गा कीलकं ,, मम रूद्र-भैरव कृपा
प्रसाद प्राप्तत्यर्थे मंत्र जपे विनियोग: !!!
ऋषि आदि न्यास :-
ॐ महामाया सहितं श्रीमन्नारायण ऋषये
नम: शिरसि !
सदाशिव -महेश्वर -मृत्युंजयरुद्रो देवताये नम: हृदये !
विराट छन्दसे नम: मुखे !
श्रीं ह्रीं कलीम महा
महेश्वर बीजाय नम: नाभयो !
रं ॐकारस्य कीलकाय नम:गुह्ये !
मम रूद्र-भैरव कृपा प्रसाद प्राप्तत्यर्थे मंत्र जपे विनियोगाय नम:
सर्वांगे !!!
करन्यास:—-
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने ॐ
ह्रीं रां सर्व-शक्ति धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नम: !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने नं रीं
नित्य -तृप्ति धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जिनीभ्यां स्वाहा !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने मं रुं अनादि शक्ति
धाम्ने अघोरात्मने मध्यमाभ्यां वषट !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने शिं रैं स्वतंत्र -शक्ति
धाम्ने वामदेवात्मने अनामिकाभ्यां हुम् !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने वां रौं अलुप्त शक्ति
धाम्ने सद्योजात्मने कनिष्ठिकाभ्यां वोषट !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने ॐ यं र:
अनादि शक्ति धाम्ने सर्वात्मने करतल कर पृष्ठाभ्यां फट !!!
निर्देश:—इसी भांति हृदयादि षड अंग न्यास करे …..!
न्यास के पश्चात् ”श्री रूद्र-भैरव” का ध्यान करे !
ध्यान :—वज्र दंष्ट्रम त्रिनयनं काल कंठमरिन्दम !
सहस्रकरमप्युग्रम वन्दे शम्भु उमा पतिम !!!
निर्देश:—–ध्यान के पश्चात् मानस-पूजन करे ! पश्चात् मंत्र जप
करे !
मंत्र :— –ॐ नमो भगवते रुद्राय आगच्छ आगच्छ
प्रवेश्य प्रवेश्य सर्व-शत्रुंनाशय-नाशय धनु: धनु: पर मंत्रान
आकर्षय-आकर्षय स्वाहा !!!
किसी भी साधना से पूर्व इस मंत्र विधि-
पूर्वक जप करने से साधक की अन्य साधना का फल
सुरक्षित रहता है ! यहाँ तक की अन्य
की विद्या का आकर्षण भी कर लेता है !
विधान में शब्द पाठ के अंत में जहाँ ”म ” आया है ,, वहां ”म” में
हलंत का प्रयोग करे ! छन्द में विराट जो है ,, ”ट” में
भी हलंत का प्रयोग होगा ! वषट और वोषट में
भी ”ट” में हलंत का प्रयोग होगा ! वो में
बड़ी मात्रा का प्रयोग करे !
दिव्य- ज्ञान प्राप्ति हेतु दुर्लभ मंत्र - साधना
मंत्र :-श्री ॐ भूर्भुव:स्व:चिदं चिदं
भयर्स्क:आद्रम आद्रा मुर्स्व: तर्जा स्व: नम: !!! विधान:-
ब्रह्म-मुहूर्त में नित्य पूजा के उपरांत इस मंत्र का जप पूजा-
स्थान पर ही करे ११ माला ,,पूर्णिमा से पूर्णिमा तक
! ..उसके पश्चात् ११ माला किसी भी समय
एक ही दिन के लिए नीम के पेड़ के
नीचे करे ! ….इस साधना के प्रभाव से साधक को दिव्य
ज्ञान की प्राप्ति होगीं ! आश्चर्यजनक
रूप से उसको शास्त्र -तत्त्व का के मूल का ज्ञान होगा !
कठिन से कठिन विषयों का सहज ही ज्ञान होगा !
तत्पश्चात नित्य ही एक माला मंत्र का जप करते रहे !
जिससे की मंत्र – शक्ति की चेतन्यता
बनी रहे …..