July 25, 2017, 06:16:31 PM

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Useful Information and Quotes / Fakir can change life of people
« Last post by admin on July 24, 2017, 09:38:50 AM »
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राबिया बसरी एक महशूर फ़क़ीर हुई है! जवानी में वह बहुत खूबसूरत थी | एक बार चोर उसे उठाकर ले गए और एक वेश्या के कोठे पर ले जाकर उसे बेच दिया | अब उसे वही कार्य करना था जो वहाँ की बाक़ी औरते करती थी |
इस नए घर में पहली रात को उसके पास एक आदमी लाया गया | उसने फौरन बातचीत शुरू कर दी | ' आप जैसे भले आदमी को देखकर मेरा दिल बहुत खुश है " वह बोली | ' आप सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ जाये , में में थोड़ी देर परमात्मा की याद में बैठ लूँ | अगर आप चाहे तो आप भी परमात्मा की याद में बैठ जाएँ | 'यह सुनकर उस नवजवान की हैरानी की कोई हद न रही | वह भी राबिया के साथ ज़मीन पर बैठ गया | फिर राबिया उठी और बोली ' मुझे विश्वास है की अगर में आपको याद दिला दूँ की एक दिन हम सबको मरना है तो आप बुरा नही मानोगे | आप यह भी भली भाँति समझ ले की जो गुनाह करने की आपके मन में चाहा है , वह आपको नर्क की आग में धकेल देगा | आप खुद ही फैसला कर ले की आप यह गुनाह करके नर्क की आग आग में कूदना चाहते है या इससे बचना चाहते है|'
यह सुनकर नवजवान हक्का बक्का रह गया| उसने संभलकर कहा, ऐ नेक और पाक औरत, तुमने मेरी आँखे खोल दी , जो अभी तक गुनाह के भयंकर नतीजे की और बंद थी | मै वादा करता हूँ की फिर कभी कोठे की तरफ कदम नही बढ़ाऊंगा |
हर रोज नए आदमी राबिया के पास भेजे जाते | पहले दिन आये नवजवान की तरह उन सबकी जिंदगी भी पलटती गयी | उस कोठे के मालिक को बहुत हैरानी हुई की इतनी खूबसूरत और नवजवान औरत है और एक बार आया ग्राहक दोबारा उसके पास जाने के लिए नही आता, जबकि लोग ऐसी सुन्दर लड़की इए दीवाने होकर उसके इर्दगिर्द | ऐसे घूमते है जैसे परवाने शमा के इर्दगिर्द | यह राज जानने के लिए उसने एक रात अपनी बीवी को ऐसी जगह छुपाकर बिठा दिया, जहां से वह राबिया के कमरे के अंदर सब कुछ देख सकती थी | वह यह जानना चाहता था की जब कोई आदमी राबिया के पास भेजा जाता है तो वह उसके साथ कैसे पेश आती है?
उस रात उसने देखा की जैसे हीं ग्राहक ने अंदर कदम रखा, राबिया उठकर खड़ी हो गई और बोली,आओ भले आदमी, आपका स्वागत है | पाप के इस घर में मुझे हमेशा याद रहता है की परमात्मा हर जगह मौजूद है | वह सब कुछ देखता है और जो चाहे कर सकता है | आपका इस बारे में क्या ख्याल है ? यह सुनकर वह आदमी हक्का बक्का रह गया और उसे कुछ समझ न आई की क्या करे ? आखिर वह कुछ हिचकिचाते हुए बोला, हाँ पंडित और मौलवी कुछ ऐसा ही कहते है |राबिया कहती गई, 'यहाँ गुनाहो से घिरे इस घर में, में कभी नही भूलती की ख़ुदा सब गुनाह देखता है और पूरा न्याय भी करता है वह हर इंसान को उसके गुनाहो की सजा देता है | जो लोग यहाँ आकर गुनाह करते है, उसकी सजा पाते है | उन्हें अनगिनत दुःख और मुसीबत झेलनी पड़ती है | मेरे भाई, हमे मनुष्य जन्म मिला है भजन बंदगी करने के लिए दुनिया के दुखो से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिये, ख़ुदा से मुलाकात करने के लिए, न की जानवरो से भी बदतर बनकर उसे बर्बाद करने के लिए |
पहले आये लोगो की तरह इस आदमी को भी राबिया की बातो में छुपी सच्चाई का अहसास हो गया | उसे जिंदगी में पहली बार महसूस हुआ की वह कितने घोर पाप करता रहा है और आज फिर करने जा रहा था | वह फूटफूट कर रोने लगा और राबिया के पाव पर गिरकर माफ़ी मांगने लगा|
राबिया के शब्द इतने सहज, निष्कपट और दिल को छु लेने वाले थे की उस कोठे के मालिक की पत्नी भी बाहर आकर अपने पापो का पश्चाताप करने लगी | फिर उसने कहा ऐ नेक पाक लड़की, तुम तो वास्तव में फ़क़ीर हो | हमने कितना बड़ा गुनाह तुम पर लादना चाहा | इसी वक्त इस पाप की दलदल से बहार निकल जाओ ' इस घटना ने उसकी अपनी जिंदगी को भी एक नया मोड़ दे दिया और उसने पाप की कमाई हमेशा के लिए छोड़ दी |
कुल मलिक के सच्चे भक्त जहां कही भी हो, जिस हालात में हो, वे हमेशा मनुष्य जन्म के असली उद्देश्य की ओर इशारा करते है और भूले भटके जीवो को नेकी की रह पर चलने की प्रेरणा देते है
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Shiva Sadhana / Different Avatar Of Lord Shiva Veerbhadra, Pippalaad, Nandi
« Last post by admin on July 24, 2017, 08:58:11 AM »
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श्रवन मास के उपल्क्षय में जाने भगवान शिव के विभिन्न अवतार।
1- वीरभद्र अवतार
भगवान शिव का यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए। शिव के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काटकर उसे मृत्युदंड दिया।
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2- पिप्पलाद अवतार
मानव जीवन में भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का बड़ा महत्व है। शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सका। कथा है कि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने बताया शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया।
श्राप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।
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3- नंदी अवतार
भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्
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Sadhana Guidelines / दुर्गा सप्तशती
« Last post by admin on April 03, 2017, 11:13:48 AM »
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कुछ लोग दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद हवन खुद की मर्जी से कर लेते है और हवन सामग्री भी खुद की मर्जी से लेते है ये उनकी गलतियों को सुधारने के लिए है।
दुर्गा सप्तशती के वैदिक आहुति की सामग्री---(एक बार ये भी करके देखे और खुद महसुस करे चमत्कारो को)
प्रथम अध्याय-एक पान देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।
द्वितीय अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, गुग्गुल विशेष
तृतीय अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 38 शहद
चतुर्थ अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं.1से11 मिश्री व खीर विशेष,
चतुर्थ अध्याय- के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुति नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से देह नाश होता है। इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर ओंम नमः चण्डिकायै स्वाहा’ बोलकर आहुति देना तथा मंत्रों का केवल पाठ करना चाहिए इनका पाठ करने से सब प्रकार का भय नष्ट हो जाता है।
पंचम अध्ययाय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 9 मंत्र कपूर, पुष्प, व ऋतुफल ही है।
षष्टम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 23 भोजपत्र।
सप्तम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में इन्द्र जौं।
अष्टम अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन।
नवम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना।
दशम अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग 31 में कत्था।
एकादश अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 मेें अनार व अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक संख्या 54 एवं 55 मेें फूल चावल और सामग्री।
द्वादश अध्याय- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 10 मेें नीबू काटकर रोली लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च श्लोक संख्या 16 में बाल-खाल श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या 20 में ऋीतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21 पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा, मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और चावल
त्रयोदश अध्याय-प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल।

दुर्गा सप्तशती के अध्याय से कामनापूर्ति-
1- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
2- द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।
3- तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।
4- चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।
5- पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।
6- षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।
7- सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।
8- अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।
9- नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
10- दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
11- एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।
12- द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।
13- त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।

दुर्गा सप्तशती का पाठ करने और सिद्ध करने की मुख्य विधियाँ:--

सामान्य विधि :
नवार्ण मंत्र जप और सप्तशती न्यास के बाद तेरह अध्यायों का क्रमशः पाठ, प्राचीन काल में कीलक, कवच और अर्गला का पाठ भी सप्तशती के मूल मंत्रों के साथ ही किया जाता रहा है। आज इसमें अथर्वशीर्ष, कुंजिका मंत्र, वेदोक्त रात्रि देवी सूक्त आदि का पाठ भी समाहित है जिससे साधक एक घंटे में देवी पाठ करते हैं।

वाकार विधि :
यह विधि अत्यंत सरल मानी गयी है। इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है।

संपुट पाठ विधि :
किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है।

सार्ध नवचण्डी विधि :
इस विधि में नौ ब्राह्मण साधारण विधि द्वारा पाठ करते हैं। एक ब्राह्मण सप्तशती का आधा पाठ करता है। (जिसका अर्थ है- एक से चार अध्याय का संपूर्ण पाठ, पांचवे अध्याय में ''देवा उचुः- नमो देव्ये महादेव्यै'' से आरंभ कर ऋषिरुवाच तक, एकादश अध्याय का नारायण स्तुति, बारहवां तथा तेरहवां अध्याय संपूर्ण) इस आधे पाठ को करने से ही संपूर्ण कार्य की पूर्णता मानी जाती है। एक अन्य ब्राह्मण द्वारा षडंग रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है। इस प्रकार कुल ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा नवचण्डी विधि द्वारा सप्तशती का पाठ होता है। पाठ पश्चात् उत्तरांग करके अग्नि स्थापना कर पूर्णाहुति देते हुए हवन किया जाता है जिसमें नवग्रह समिधाओं से ग्रहयोग, सप्तशती के पूर्ण मंत्र, श्री सूक्त वाहन तथा शिवमंत्र 'सद्सूक्त का प्रयोग होता है जिसके बाद ब्राह्मण भोजन,' कुमारी का भोजन आदि किया जाता है। वाराही तंत्र में कहा गया है कि जो ''सार्धनवचण्डी'' प्रयोग को संपन्न करता है वह प्राणमुक्त होने तक भयमुक्त रहता है, राज्य, श्री व संपत्ति प्राप्त करता है।

शतचण्डी विधि :
मां की प्रसन्नता हेतु किसी भी दुर्गा मंदिर के समीप सुंदर मण्डप व हवन कुंड स्थापित करके (पश्चिम या मध्य भाग में) दस उत्तम ब्राह्मणों (योग्य) को बुलाकर उन सभी के द्वारा पृथक-पृथक मार्कण्डेय पुराणोक्त श्री दुर्गा सप्तशती का दस बार पाठ करवाएं। इसके अलावा प्रत्येक ब्राह्मण से एक-एक हजार नवार्ण मंत्र भी करवाने चाहिए। शक्ति संप्रदाय वाले शतचण्डी (108) पाठ विधि हेतु अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा का दिन शुभ मानते हैं। इस अनुष्ठान विधि में नौ कुमारियों का पूजन करना चाहिए जो दो से दस वर्ष तक की होनी चाहिए तथा इन कन्याओं को क्रमशः कुमारी, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, कालिका, शाम्भवी, दुर्गा, चंडिका तथा मुद्रा नाम मंत्रों से पूजना चाहिए। इस कन्या पूजन में संपूर्ण मनोरथ सिद्धि हेतु ब्राह्मण कन्या, यश हेतु क्षत्रिय कन्या, धन के लिए वेश्य तथा पुत्र प्राप्ति हेतु शूद्र कन्या का पूजन करें। इन सभी कन्याओं का आवाहन प्रत्येक देवी का नाम लेकर यथा ''मैं मंत्राक्षरमयी लक्ष्मीरुपिणी, मातृरुपधारिणी तथा साक्षात् नव दुर्गा स्वरूपिणी कन्याओं का आवाहन करता हूं तथा प्रत्येक देवी को नमस्कार करता हूं।'' इस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए। वेदी पर सर्वतोभद्र मण्डल बनाकर कलश स्थापना कर पूजन करें। शतचण्डी विधि अनुष्ठान में यंत्रस्थ कलश, श्री गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तऋषी, सप्तचिरंजीव, 64 योगिनी 50 क्षेत्रपाल तथा अन्याय देवताओं का वैदिक पूजन होता है। जिसके पश्चात् चार दिनों तक पूजा सहित पाठ करना चाहिए। पांचवें दिन हवन होता है।

इन सब विधियों (अनुष्ठानों) के अतिरिक्त प्रतिलोम विधि, कृष्ण विधि, चतुर्दशीविधि, अष्टमी विधि, सहस्त्रचण्डी विधि (1008) पाठ, ददाति विधि, प्रतिगृहणाति विधि आदि अत्यंत गोपनीय विधियां भी हैं जिनसे साधक इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति कर सकता है।

नवरात्री घट स्थापना एवं पूजन विधि,...........

हिन्दू शास्त्रों में किसी भी पूजन से पूर्व, भगवान गणेशजी की आराधना का प्रावधान बताया गया है।
माता जी की पूजा में कलश से संबन्धित एक मान्यता है के अनुसार कलश को भगवान श्री गणेश का प्रतिरुप माना गया है। इसलिये सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है। कलश स्थापना करने से पहले पूजा स्थान को गंगा जल से शुद्ध किया जाना चाहिए। पूजा में सभी देवताओं आमंत्रित किया जाता है। कलश में सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी,मुद्रा रखी जाती है। और पांच प्रकार के पत्तों से कलश को सजाया जाता है। इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बौये जाते है। जिन्हें दशमी की तिथि पर काटा जाता है। माता दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल के मध्य में स्थापित की जाती है।
कलश स्थापना के बाद, गणेश भगवान और माता दुर्गा जी की आरती से, नौ दिनों का व्रत प्रारंभ किया जाता है। कई व्यक्ति पूरे नौ दिन तो यह व्रत नहीं रख पाते हैं किन्तु प्रारंभ में ही यह संकल्प लिया जाता है कि व्रत सभी नौ दिन रखने हैं अथवा नौ में से कुछ ही दिन व्रत रखना है।

पूजन सामग्री............

माँ दुर्गा की सुन्दर प्रतिमा, माता की प्रतिमा स्थापना के लिए चौकी, लाल वस्त्र , कलश/ घाट , नारियल का फल, पांच पल्लव आम का, फूल,अक्षत, मौली, रोली, पूजा के लिए थाली , धुप और दशांग, गंगा का जल, कुमकुम, गुलाल पान,सुपारी, चौकी,दीप, नैवेद्य,कच्चा धागा, दुर्गा सप्तसती किताब ,चुनरी, पैसा, माता दुर्गा की विशेष कृपा हेतु संकल्प तथा षोडशोपचार पूजन करने के बाद, प्रथम प्रतिपदा तिथि को, नैवेद्य के रूप में गाय का घी माता को अर्पित करना चाहिए तथा पुनः वह घी किसी ब्राह्मण को दे देना चाहिए।

घट स्थापना विधि
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ॐ अंगिरसाय विद्महे दण्डायुधाय धीमहि तन्नो जीवः प्रचोदयात्
Om Angirasaaya Vidamahe Dandayudhaaya Dheemahi Tanno Jivaha Prachodayat

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10….साधक सर्वप्रथम स्नान आदि से शुद्ध हो कर अपने पूजा गृह में पूर्व या उत्तर की ओर मुह कर आसन पर बैठ जाए अब सर्व प्रथम आचमन – पवित्रीकरण करने के बाद गणेश -गुरु तथा अपने इष्ट देव/ देवी का पूजन सम्पन्न कर ले तत्पश्चात पीपल के 09 पत्तो को भूमि पर अष्टदल कमल की भाती बिछा ले ! एक पत्ता मध्य में तथा शेष आठ पत्ते आठ दिशाओ में रखने से अष्टदल कमल बनेगा ! इन पत्तो के ऊपर आप माला को रख दे ! अब अपने समक्ष पंचगव्य तैयार कर के रख ले किसी पात्र में और उससे माला को प्रक्षालित ( धोये ) करे ! आप सोचे-गे कि पंचगव्य क्या है ? तो जान ले गाय का दूध , दही , घी , गोमूत्र , गोबर यह पांच चीज गौ का ही हो उसको पंचगव्य कहते है ! पंचगव्य से माला को स्नान करना है – स्नान करते हुए अं आं इत्यादि सं हं पर्यन्त समस्त स्वर वयंजन का उच्चारण करे ! फिर समस्य़ा हो गयी यहाँ कि यह अं आं इत्यादि सं हं पर्यन्त समस्त स्वर वयंजन क्या है ? तो नोट कर ले – ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं !! यह उच्चारण करते हुए माला को पंचगव्य से धोले ध्यान रखे इन समस्त स्वर का अनुनासिक उच्चारण होगा !
माला को पंचगव्य से स्नान कराने के बाद निम्न मंत्र बोलते हुए माला को जल से धो ले –
ॐ सद्यो जातं प्रद्यामि सद्यो जाताय वै नमो नमः
भवे भवे नाति भवे भवस्य मां भवोद्भवाय नमः !!
अब माला को साफ़ वस्त्र से पोछे और निम्न मंत्र बोलते हुए माला के प्रत्येक मनके पर चन्दन- कुमकुम आदि का तिलक करे –
ॐ वामदेवाय नमः जयेष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कल विकरणाय नमो बलविकरणाय नमः !
बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः सर्वभूत दमनाय नमो मनोनमनाय नमः !!
अब धूप जला कर माला को धूपित करे और मंत्र बोले –
ॐ अघोरेभ्योथघोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्य: सर्वेभ्य: सर्व शर्वेभया नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्य:
अब माला को अपने हाथ में लेकर दाए हाथ से ढक ले और निम्न मंत्र का १०८ बार जप कर उसको अभिमंत्रित करे –
ॐ ईशानः सर्व विद्यानमीश्वर सर्वभूतानाम ब्रह्माधिपति ब्रह्मणो अधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम !!
अब साधक माला की प्राण – प्रतिष्ठा हेतु अपने दाय हाथ में जल लेकर विनियोग करे –
ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्रा ऋषय: ऋग्यजु:सामानि छन्दांसि प्राणशक्तिदेवता आं बीजं ह्रीं शक्ति क्रों कीलकम अस्मिन माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः !!
अब माला को बाय हाथ में लेकर दाय हाथ से ढक ले और निम्न मंत्र बोलते हुए ऐसी भावना करे कि यह माला पूर्ण चैतन्य व शक्ति संपन्न हो रही है !
ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम प्राणा इह प्राणाः ! ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम जीव इह स्थितः ! ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम सर्वेन्द्रयाणी वाङ् मनसत्वक चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण प्राणा इहागत्य इहैव सुखं तिष्ठन्तु स्वाहा ! ॐ मनो जूतिजुर्षतामाज्यस्य बृहस्पतिरयज्ञमिमन्तनो त्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु विश्वे देवास इह मादयन्ताम् ॐ प्रतिष्ठ !!
अब माला को अपने मस्तक से लगा कर पूरे सम्मान सहित स्थान दे ! इतने संस्कार करने के बाद माला जप करने योग्य शुद्ध तथा सिद्धिदायक होती है भाइयो !
नित्य जप करने से पूर्व माला का संक्षिप्त पूजन निम्न मंत्र से करने के उपरान्त जप प्रारम्भ करे –
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नरसिंह प्रचंड मंत्र प्रयोग
मंत्र १ : प्रचण्ड्भूतेश्वर नृसिंह शाबर मन्त्र : ll
ॐ नमो भगवते नारसिंहाय -घोर रौद्र महिषासुर रूपाय
,त्रेलोक्यडम्बराय रोद्र क्षेत्रपालाय ह्रों ह्रों
क्री क्री क्री ताडय
ताडय मोहे मोहे द्रम्भी द्रम्भी
क्षोभय क्षोभय आभि आभि साधय साधय ह्रीं
हृदये आं शक्तये प्रीतिं ललाटे बन्धय बन्धय
ह्रीं हृदये स्तम्भय स्तम्भय किलि किलि ईम
ह्रीं डाकिनिं प्रच्छादय २ शाकिनिं प्रच्छादय २ भूतं
प्रच्छादय २ प्रेतं प्रच्छादय २ ब्रंहंराक्षसं सर्व योनिम
प्रच्छादय २ राक्षसं प्रच्छादय २ सिन्हिनी पुत्रं
प्रच्छादय २ अप्रभूति अदूरि स्वाहा एते डाकिनी
ग्रहं साधय साधय शाकिनी ग्रहं साधय साधय
अनेन मन्त्रेन डाकिनी शाकिनी भूत
प्रेत पिशाचादि एकाहिक द्वयाहिक् त्र्याहिक चाथुर्थिक पञ्च
वातिक पैत्तिक श्लेष्मिक संनिपात केशरि डाकिनी
ग्रहादि मुञ्च मुञ्च स्वाहा मेरी भक्ति गुरु
की शक्ति स्फ़ुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा ll
मंत्र २ : भूत भाषन नृसिन्हमन्त्र : ॐ नमो आदेश गुरु को
,ॐ नमो जय जय नर्सिह हाथ चबाता होठ चबाता रक्त
भरा देह दौड दौड कर तीन लोक मे दुष्ट चबाता भूत प्रेत
के हाड चबाता नयन लाल लाल से आग लगाता.. जला भूत राक्षस कि
देह, देह मे लाव एन्च खेन्च के पाव के अन्गुठन से गोडा से
पिण्डी से जाण्घः से योनि से अण्ड से लिङ्ग से गुदा से
पेडु से नाभि को बचा हाथ् कन्धा गले क घण्टा हिलय हिलय के
निकाल ला कलेजे मे बेठी जात को चोट पकड के ला ..लाव
रे शेरमुखी.. जबान तक लाव बोलणे दे जो सत्य कि
वाणी भेद बताई तो सुखं पाइ… जे ना बोलवे भूत को तो सरबा
उडत आवे तेरा लङ्गोता फ़ा ड के फ़ेकेगा …बे रियन पचः पच भक्तान
प्राणं रक्ष रक्ष क्ष्रों स्वाहा देखु मेरे गुरु के शबद कि शक्ति चल
भूत बकता होय ….आदेश आदेश
मन्त्र संख्या . २ से नाक में ऊपर लिखे गए सामग्री या
घी गुग्गल से धुप दे तो भूत बोलने लगेगा जो बोलेगा सत्य
होगा साडी बात पूछ कर उसके जाने को कहे… अगर
उसकी इच्छा छोटी सी या सरल
हो तो पूरी कर के भेज दे, वापिस कभी न
आने का वचन ले कर जाने दे, अगर न माँने तो कनिस्थिका और
चोटी पकड़ कर मंत्र १ का जाप शुरू करे सरसों के तेल में
गुग्गल डाल कर धुनी लगाये नीम के पत्ते
सेंध नमक डाले… रोगी को दिखा दिखा कर सुंघा कर ५
नीम्बू १७ कील ८ पताशा
रातरानी का इत्र,५ गुलाब फूल १ कलेजी,
मधु और एक तरफ से सिकी हुइ रोटी और
थोडा घी ५२ बार उतार कर एक नयी
कची हांड़ी या मटकी में डाले…
उतारते समय मन्त्र पढ़ पढ़ कर रोगी को
पीली सरसों मारते रहे ..भुत जाने
की विनती करेगा उस से वचन ले ले
की फिर लौट के कभी न आये ..हो सके तो
उसकी मुक्ति का उपाय जान ले ..उसे हांड़ी
में आने को कह दे . भुत हांडी में आ जाये तब
हाडी थोड़ी हिल जाएगी
,हांड़ी के मुह को गंगा जल से भीगे नए
लाल कपडे से बंद कर के पीपल के पेड़ के निचे गाड कर
आ जाये ..पीछे मुड़े तो भूत वापिस आ जाएगा .
ये महा प्रयोग केवल अत्यंत घोर आत्माओ और असाद्य होने पर
ही करे, सामान्य स्थिति के लिए नहीं …
अंतिम उपाय के तौर पर काम में लेना चाहिए , पूर्ण होने पर दान प्रकृति
पुण्य कर्म करना ज़रूरी है.. तीर्थ आदि में
जाने पर उस आत्मा की मुक्ति के लिए भी
कुछ किया जाए तो आने वाले जन्मो के ऋण से भी मुक्ति
होगी,एसा फिर कभी भी
नहीं होगा… आदेश
भगवान श्री शरभेश्वर-शालुव - पक्षिराज का
चिंतामणि शाबर - मंत्र
मंत्र:—- ॐ नमो आदेश गुरु को ! चेला सुने गुरु
फ़रमाय ! सिंह दहाड़े घर में जंगल में ना जाये ,घर को फोरे ,
घर को तोरे , घर में नर को खाय !जिसने पाला उसी
का जीजा साले से घबराय ! आधा हिरना आधा घोडा
गऊ का रूप बनाय ! एकानन में दुई चुग्गा , सो
पक्षी रूप हो जाय ! चार टांग नीचे
देखूं , चार तो गगन सुहाय ! फूंक मर जल-भूंज जाय
,,काली-दुर्गा खाय ! जंघा पे बैठा यमराज
महाबली , मार के हार बनाय ! भों भों बैठे भैरू बाबा
, नाग गले लिपटाय ! एक झपट्टा मार के पक्षी ,
सिंह ले उड़ जाय ! देख देख जंगल के राजा
पक्षी से घबराय ! ”””’ॐ खें खां खं
फट प्राण ले लो , प्राण ले लो —-घर के लोग चिल्लाय !
ॐ शरभ -शालुव -पक्षिराजाय नम: !
मेरी भक्ति , गुरु की शक्ति , फुरो
मंत्र ईश्वरॊवाचा ! दुहाई महारुद्र की ! देख चेला
पक्षी का तमाशा स्वाहा ””” !!!…..
विधान/;- यह मंत्र साधारण मंत्र नहीं ! अपितु शाबर
मंत्रो में चिंतामणि मंत्र है ! मेरे परिवार की शरभ -साधना
– परम्परा में यह मंत्र क्रियात्मक रूप से प्रचलित रहा ! कुछ
समय पूर्व मेने इस मंत्र को एक प्रसिद्ध पंचांग में भी
प्रकाशित किया था —-सर्व प्रथम ! उसके पश्चात एक पत्रिका ने
इसको पंचांग से लेकर प्रकाशित कर दिया ! अब कुछ वर्षो पूर्व
ही मेने मेरी पुस्तक ”निग्रह-दारुण-
सप्तकं” में इस मंत्र को -[अन्य और भी शाबर मंत्रो
के साथ ]
प्रकाशित किया है ! ये मंत्र अत्यंत ही घोर मंत्र है !
किसी भी महापर्व में इस मंत्र का
अनुष्ठान आरम्भ करे ! श्मशान में , शिव मंदिर में , निर्जन स्थान में ,
तलघर में , शुन्यागार में ..या अपनी पूजा-कक्ष में
भी ! २१ दिन नित्य रात्रि में रुद्राक्ष की माला
पर ५ माला जप करे ! दिशा उत्तर , रक्त आसन , दीपक
प्रज्ज्वलित रहे !
चर्पटी नाथ परम्परा का अद्दभुत शाबर - मंत्र
श्री दत्त आदार्यु श्रुस्रेस्व:हुम् साबरमम अधरमम
ब्रहम निर्हरा सटी , पदम् पदाम्त्रिश
केश्वरीम ॐ भू : स्व:स्ति !!!———– इस
मंत्र को भोवल मंत्र कहते हैं ! भोवल अर्थात चक्कर आना ,,
मस्तक बधिर होना ! यह भोवल-रोग पशुओ और मनुष्य दोनों पर
ही अपना प्रभाव दिखता है ! इससे पीड़ित
प्राणी जगह जगह गोल गोल घुमने लगता है और
पागलो जेसी हरकत करने लगता है !
प्रस्तुत मंत्र स्वयं सिद्ध है ,, फिर भी
किसी महापर्व में इस मंत्र का जप अपने आराध्य-देव
के सम्मुख ..धुप-दीप प्रजव्लित करके ११ माला
की संख्या में कीजिये ! …………..
जब किसी समय इस रोग से पीड़ित
प्राणी पर इस मंत्र प्रयोग करना हो तो भस्म या शुद्ध
मिटटी अपने हाथ में लीजिये और मंत्र से
११ बार अभिमंत्रित कीजिये और रोगी पर
फेंक या उसके मस्तक पर लगा दीजिये ……मंत्र-प्रभाव
से तुरंत चमत्कार-पूर्ण लाभ होगा ! उसके पश्चात किसी
काले धागे में ११ गांठ मंत्र उचारण की साथ लगाये और
रोगी के गले में धारण करवा दे..!!! ..ये मंत्र मुझे परम्परा
से प्राप्त है … साधक जनों के लाभार्थ इसे यहाँ प्रस्तुत किया !
मंत्र शुद्ध है……..
आत्म रक्षा मंत्र एवं प्रयोग
मंत्र : तीन पैर तेरे राई मसान भूम धरती
आई धरती में से जगे जीव सांप बिच्छू
गोहेरा सर्व विद्विषो भस्म करता आवे माता पारवती
की आन है गुरु गोरखनाथ जी
की आन है सबको भस्म करता आवे माम् रक्षा कुरु
कुरुमाम रक्ष रक्ष ॐ हुम जोम सः रीम हूँ
फट !!
विधि : गोबर और कलि मिटटी से चोका बना कर उस पर
हिंगुल सिन्दूर से कालि यन्त्र बना कर सभी गुरु जन
गणेश एवं शिव जी आदि मुख्या देवताओ के ज्ञात मंत्र
5-5 पढ़े और उस पर आम की लकड़ी
बिछा दे और एक लोहे का छोटा चाकू भी रख दे …
पूर्वाभिमुख होकर अग्नि जलाये , उस अग्नि में 108 बार
घी से गुरुमंत्र की आहुति दे , फिर इस
मंत्र से 108 आहुति घी ,गूग्गुल और लाल कनेर के
फूल से दे ..
हवन के बाद अग्नि के चारो और चन्दन और उत्तम इत्र मिले जल
से चारू करे …
अग्नि शांत होने पर उसमे से चाकू निकल ले और भस्म और निर्माल्य
को बहते पानी में बहा दे। थोड़ी
सी भस्म को अपने पास रख ले / आसन कम्बल का
और तिलक चन्दन से करे …
उतने से पूर्व आसन की धुल सर पर लगा ले,धुल न हो
तो थोड़ी पहले ही रख ले …
प्रयोग : जाप आदि से पहले जहा आवश्यक हो और अन्य
कभी भी जहा भय हो तब इस चाकू से कार
कर ले …
भस्म से भय भूत आदि से ग्रस्त रोगी को खिला दे
,पानी में मिला के छिड़क दे या तिलक कर दे।।।
सभी दोष दूर होते है।।
जाप में रक्षा होती है।।।
ये अमोघ काल भैरव रक्षा विधान नागार्जुन नाथ शाबर विद्या से उद्धरित
एवं अनुभूत है
कन्या के विवाह हेतु अघोर शाबर मंत्र :
तू देख पूरब उग्ग्या सूरज देवता ॐ नमो नमः अब हम
देखा पश्चिम …मस्त चलंता मखना हाथी त्तेते सोहे
ज़र्द अम्बारी ते पर बैठी कौन
सवारी ?? ते पर बैठी पठान की
सवारी.. कोंन पठान ..कमाल खान कमाल खान मुग़ल पठान
बेठ्यो चबूतरे पढ़े कुरआन ,हज्जार काम दुनिया का करया ..एक काम
मेरो कर , न करे तो तीन लाख ३३ हज़ार पैगम्बरों
की दुहाई …तेरे को माता अन्जिनी के पूत
की दुहाई .आदेश गुरु औघड़ नाथ जी का ..
विधि : कन्या जुम्मेरात (गुरुवार) से काले हकिक या कमलगट्टे
की माला १० माला जाप मुस्लिम रीति से
(गुलाब की गंध,पश्चिमाभिमुख,सूती आसन
एकांत कक्ष ) घर के लोग तपास करे तो उत्तम रिश्ता
जल्दी से तय होगा फिर कमाल खान ,हनुमान
जी और औघड़ नाथ जी के नाम से छोटे /
अनाथ बच्चो को मिठाई रेवड़ी आदि खिलाये.
पद्मावती -मंत्र - साधन
मंत्र-:—— ”’ॐ पद्मावती
पद्मंकुशी वज्र वज्रांकुशी प्रत्यक्षं भवति
!”’ विधान:—– रात्रि के समय मिटटी के
दीपक में दीप प्रज्जवलित कर , रक्त -
कम्बल के आसन में बैठकर ,, उत्तरदिशा की और मुख
करके ,, पद्मावती का ध्यान करके सूतिका
की माला से १०००जप करे ——–२१ दिन तक !
आठवे दिन से ही मंत्र का प्रभाव अनुभूत होने लगेगा !
साधना काल में पवित्रता का विशेष ध्यान रखे और साधना विषय गुप्त
भी
अति -शीघ्र धन प्राप्ति हेतु एक अद्भुत मंत्र -विधान
मंत्र:——– ”’ग्लोड़ प्लाड़ धिन धिन सूड धेबिसन धनचर विक्रट रहा
ब्लैंड हबताये ॐ महारुद्राय नम:”” !!!
विधान:—–यह एक कापालिक मंत्र है ! श्वेत या गुलाबी
आसन पर बैठ कर , वायव्य-कोण में मुख करके , महारुद्र भगवान
शिव का ध्यान करते हुए , कमल-बीजो की
माला से ११ माला मंत्र जप करे !
जप के पश्चात् १०८ कमल बीजो को गाय के
घी में डुबाकर १०८ बार मंत्र जप करते हुए , अग्नि में
आहुति दे नित्य क्रम में ही !
समय निश्चित रखे ,, साधना -प्रयोग का !
अत: सुबह या रात्रि …किसी एक समय ही
करे ! ११ दिन तक ये विधान करते रहे ! अनुष्ठान काल के अंतर्गत
ही
आवश्यकता पूर्ति हेतु जितना धन आवश्यक है उतने धन प्राप्ति के
किसी ना किसी अज्ञात कारण-माध्यम से
योग निर्मित होने लगते हैं ! और धन प्राप्त हो जाता है ! मंत्र कुछ
अटपटी-भाषा में है ! अत: विचार ना करे !
श्री रूद्र -भैरव मंत्र- विधान
विनियोग :- अस्य श्रीरूद्र-भैरव मंत्रस्य महामाया
सहितं श्रीमन्नारायण ऋषि: ,, सदाशिव महेश्वर-
मृत्युंजय-रुद्रो-देवता ,, विराट छन्द: ,, श्रीं
ह्रीं क्ली महा महेश्वर
बीजं ,, ह्रीं गौरी शक्ति: ,, रं
ॐकारस्य दुर्गा कीलकं ,, मम रूद्र-भैरव कृपा
प्रसाद प्राप्तत्यर्थे मंत्र जपे विनियोग: !!!
ऋषि आदि न्यास :-
ॐ महामाया सहितं श्रीमन्नारायण ऋषये
नम: शिरसि !
सदाशिव -महेश्वर -मृत्युंजयरुद्रो देवताये नम: हृदये !
विराट छन्दसे नम: मुखे !
श्रीं ह्रीं कलीम महा
महेश्वर बीजाय नम: नाभयो !
रं ॐकारस्य कीलकाय नम:गुह्ये !
मम रूद्र-भैरव कृपा प्रसाद प्राप्तत्यर्थे मंत्र जपे विनियोगाय नम:
सर्वांगे !!!
करन्यास:—-
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने ॐ
ह्रीं रां सर्व-शक्ति धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नम: !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने नं रीं
नित्य -तृप्ति धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जिनीभ्यां स्वाहा !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने मं रुं अनादि शक्ति
धाम्ने अघोरात्मने मध्यमाभ्यां वषट !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने शिं रैं स्वतंत्र -शक्ति
धाम्ने वामदेवात्मने अनामिकाभ्यां हुम् !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने वां रौं अलुप्त शक्ति
धाम्ने सद्योजात्मने कनिष्ठिकाभ्यां वोषट !
ॐ नमो भगवते ज्वल ज्ज्वालामालिने ॐ यं र:
अनादि शक्ति धाम्ने सर्वात्मने करतल कर पृष्ठाभ्यां फट !!!
निर्देश:—इसी भांति हृदयादि षड अंग न्यास करे …..!
न्यास के पश्चात् ”श्री रूद्र-भैरव” का ध्यान करे !
ध्यान :—वज्र दंष्ट्रम त्रिनयनं काल कंठमरिन्दम !
सहस्रकरमप्युग्रम वन्दे शम्भु उमा पतिम !!!
निर्देश:—–ध्यान के पश्चात् मानस-पूजन करे ! पश्चात् मंत्र जप
करे !
मंत्र :— –ॐ नमो भगवते रुद्राय आगच्छ आगच्छ
प्रवेश्य प्रवेश्य सर्व-शत्रुंनाशय-नाशय धनु: धनु: पर मंत्रान
आकर्षय-आकर्षय स्वाहा !!!
किसी भी साधना से पूर्व इस मंत्र विधि-
पूर्वक जप करने से साधक की अन्य साधना का फल
सुरक्षित रहता है ! यहाँ तक की अन्य
की विद्या का आकर्षण भी कर लेता है !
विधान में शब्द पाठ के अंत में जहाँ ”म ” आया है ,, वहां ”म” में
हलंत का प्रयोग करे ! छन्द में विराट जो है ,, ”ट” में
भी हलंत का प्रयोग होगा ! वषट और वोषट में
भी ”ट” में हलंत का प्रयोग होगा ! वो में
बड़ी मात्रा का प्रयोग करे !
दिव्य- ज्ञान प्राप्ति हेतु दुर्लभ मंत्र - साधना
मंत्र :-श्री ॐ भूर्भुव:स्व:चिदं चिदं
भयर्स्क:आद्रम आद्रा मुर्स्व: तर्जा स्व: नम: !!! विधान:-
ब्रह्म-मुहूर्त में नित्य पूजा के उपरांत इस मंत्र का जप पूजा-
स्थान पर ही करे ११ माला ,,पूर्णिमा से पूर्णिमा तक
! ..उसके पश्चात् ११ माला किसी भी समय
एक ही दिन के लिए नीम के पेड़ के
नीचे करे ! ….इस साधना के प्रभाव से साधक को दिव्य
ज्ञान की प्राप्ति होगीं ! आश्चर्यजनक
रूप से उसको शास्त्र -तत्त्व का के मूल का ज्ञान होगा !
कठिन से कठिन विषयों का सहज ही ज्ञान होगा !
तत्पश्चात नित्य ही एक माला मंत्र का जप करते रहे !
जिससे की मंत्र – शक्ति की चेतन्यता
बनी रहे …..
7
इस सृष्टि का निर्माण भगवान शिव की इच्छा मात्र से ही हुआ है। अत: इनकी भक्ति करने वाले व्यक्ति को संसार की सभी वस्तुएं प्राप्त हो सकती हैं। शिवजी अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। शिवपुराण के अनुसार, नियमित रूप से शिवलिंग का पूजन करने वाले व्यक्ति के जीवन में दुखों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।

शिवपुराण में एक ऐसा शास्त्र है, जिसमें शिवजी और सृष्टि के निर्माण से जुड़ी रहस्यमयी बातें बताई गई हैं। इस पुराण में कई चमत्कारी उपाय भी बताए गए हैं, जो हमारे जीवन की धन संबंधी समस्याएं को तो खत्म करते हैं। साथ ही, अक्षय पुण्य भी प्रदान करते हैं।
 इन उपायों से पिछले पापों का नाश होता है और भविष्य सुखद बनता है।

यदि आप भी शिवजी की कृपा से धन संबंधी समस्याओं से छुटकारा पाना चाहते हैं तो यहां बताया गया आसान और उपाय रोज रात को करना चाहिए, यह उपाय शिव पुराण में बताया गया है…

 
शिवलिंग के पास रोज रात को लगाएं दीपक

पुराने समय से ही कई ऐसी परंपराएं प्रचलित हैं, जिनका पालन करने पर व्यक्ति को सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इन प्रथाओं का पालन न करने पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शुभ फलों की प्राप्ति के लिए एक परंपरा है कि प्रतिदिन रात्रि के समय शिवलिंग के समक्ष दीपक लगाना चाहिए। इस उपाय के पीछे एक प्राचीन कथा बताई गई है।

कथा

कथा के अनुसार प्राचीन काल में गुणनिधि नामक व्यक्ति बहुत गरीब था और वह भोजन की खोज में लगा हुआ था। इस खोज में रात हो गई और वह एक शिव मंदिर में पहुंच गया। गुणनिधि ने सोचा कि उसे रात्रि विश्राम इसी मंदिर में कर लेना चाहिए। रात के समय वहां अत्यधिक अंधेरा हो गया। इस अंधकार को दूर करने के लिए उसने शिव मंदिर में अपनी कमीज जलायी थी। रात्रि के समय भगवान शिव के समक्ष प्रकाश करने के फलस्वरूप से उस व्यक्ति को अगले जन्म में देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देव का पद प्राप्त हुआ।

इस कथा के अनुसार ही शाम के समय शिव मंदिर में दीपक लगाने वाले व्यक्ति को अपार धन-संपत्ति एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं। अत: नियमित रूप से रात्रि के समय किसी भी शिवलिंग के समक्ष दीपक लगाना चाहिए। दीपक लगाते समय ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करना चाहिए।

शिवजी के पूजन से श्रद्धालुओं की धन संबंधी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। शास्त्रों में एक अन्य सटीक उपाय बताया गया है जिसे नियमित रूप से अपनाने वाले व्यक्ति अपार धन-संपत्ति प्राप्त हो सकती है। इस उपाय के साथ ही प्रतिदिन सुबह के समय शिवलिंग पर जल, दूध, चावल आदि पूजन सामग्री अर्पित करना चाहिए।

भगवान शिव बहुत भोले हैं, यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा से उन्हें सिर्फ एक लोटा पानी भी अर्पित करे तो भी वे प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए उन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कुछ छोटे और अचूक उपायों के बारे शिवपुराण में भी लिखा है। ये उपाय इतने सरल हैं कि इन्हें बड़ी ही आसानी से किया जा सकता है। हर समस्या के समाधान के लिए शिवपुराण में एक अलग उपाय बताया गया है।  ये उपाय इस प्रकार हैं-

शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव को प्रसन्न करने के उपाय इस प्रकार हैं-

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।

यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में बांट देना चाहिए।

शिवपुराण के अनुसार, जानिए भगवान शिव को कौन-सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से क्या फल मिलता है-

1.बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

3. शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

4. शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

5. शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।

6. यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है।

शिवपुराण के अनुसार, जानिए भगवान शिव को कौन-सा फूल चढ़ाने से क्या फल मिलता है-

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।

6. जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजन में शुभ माना गया है।

11. दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

इन उपायों से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव

1. सावन में रोज 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ऊं नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।

2. अगर आपके घर में किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो सावन में रोज सुबह घर में गोमूत्र का छिड़काव करें तथा गुग्गुल का धूप दें।

3. यदि आपके विवाह में अड़चन आ रही है तो सावन में रोज शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं। इससे जल्दी ही आपके विवाह के योग बन सकते हैं।

4. सावन में रोज नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में सुख-समृद्धि आएगी और मन प्रसन्न रहेगा।

5. सावन में गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।

6. सावन में रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निपट कर समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं और भगवान शिव का जल से अभिषेक करें और उन्हें काले तिल अर्पण करें। इसके बाद मंदिर में कुछ देर बैठकर मन ही मन में ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इससे मन को शांति मिलेगी।

7. सावन में किसी नदी या तालाब जाकर आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं। जब तक यह काम करें मन ही मन में भगवान शिव का ध्यान करते रहें। यह धन प्राप्ति का बहुत ही सरल उपाय है।

आमदनी बढ़ाने के लिए

सावन के महीने में किसी भी दिन घर में पारद शिवलिंग की स्थापना करें और उसकी यथा विधि पूजन करें। इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का 108 बार जप करें-

ऐं ह्रीं श्रीं ऊं नम: शिवाय: श्रीं ह्रीं ऐं

प्रत्येक मंत्र के साथ बिल्वपत्र पारद शिवलिंग पर चढ़ाएं। बिल्वपत्र के तीनों दलों पर लाल चंदन से क्रमश: ऐं, ह्री, श्रीं लिखें। अंतिम 108 वां बिल्वपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद निकाल लें तथा उसे अपने पूजन स्थान पर रखकर प्रतिदिन उसकी पूजा करें। माना जाता है ऐसा करने से व्यक्ति की आमदानी में इजाफा होता है।

संतान प्राप्ति के लिए उपाय

सावन में किसी भी दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव का पूजन करें। इसके पश्चात गेहूं के आटे से 11 शिवलिंग बनाएं। अब प्रत्येक शिवलिंग का शिव महिम्न स्त्रोत से जलाभिषेक करें। इस प्रकार 11 बार जलाभिषेक करें। उस जल का कुछ भाग प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। यह प्रयोग लगातार 21 दिन तक करें। गर्भ की रक्षा के लिए और संतान प्राप्ति के लिए गर्भ गौरी रुद्राक्ष भी धारण करें। इसे किसी शुभ दिन शुभ मुहूर्त देखकर धारण करें।

बीमारी ठीक करने के लिए उपाय

सावन में किसी सोमवार को पानी में दूध व काले तिल डालकर शिवलिंग का अभिषेक करें। अभिषेक के लिए तांबे के बर्तन को छोड़कर किसी अन्य धातु के बर्तन का उपयोग करें। अभिषेक करते समय ऊं जूं स: मंत्र का जाप करते रहें। इसके बाद भगवान शिव से रोग निवारण के लिए प्रार्थना करें और प्रत्येक सोमवार को रात में सवा नौ बजे के बाद गाय के सवा पाव कच्चे दूध से शिवलिंग का अभिषेक करने का संकल्प लें। इस उपाय से बीमारी ठीक होने में लाभ मिलता है।
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Sadhana Guidelines / गुप्त नवरात्रि
« Last post by admin on June 01, 2016, 08:16:31 AM »
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गुप्त नवरात्रि :-
गुप्त नवरात्र हिन्दू धर्म में उसी प्रकार मान्य हैं, जिस प्रकार 'शारदीय' और 'चैत्र नवरात्र'। आषाढ़ और माघ माह के नवरात्रों को "गुप्त नवरात्र" कह कर पुकारा जाता है। बहुत कम लोगों को ही इसके ज्ञान या छिपे हुए होने के कारण इसे 'गुप्त नवरात्र' कहा जाता है। गुप्त नवरात्र मनाने और इनकी साधना का विधान 'देवी भागवत' व अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। श्रृंगी ऋषि ने गुप्त नवरात्रों के महत्त्व को बतलाते हुए कहा है कि- "जिस प्रकार वासंतिक नवरात्र में भगवान विष्णु की पूजा और शारदीय नवरात्र में देवी शक्ति की नौ देवियों की पूजा की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं। यदि कोई इन महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना करें, तो जीवन धन-धान्य, राज्य सत्ता और ऐश्वर्य से भर जाता है।
तिथि -
सामान्यत: लोग वर्ष में पड़ने वाले केवल दो नवरात्रों के बारे में ही जानते हैं- 'चैत्र' या 'वासंतिक नवरात्र' व 'आश्विन' या 'शारदीय नवरात्र', जबकि इसके अतिरिक्त दो और नवरात्र भी होते हैं, जिनमें विशेष कामनाओं की सिद्धि की जाती है। कम लोगों को इसका ज्ञान होने के कारण या इसके छिपे हुए होने के कारण ही इसको "गुप्त नवरात्र" कहते हैं। वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्र आते हैं- माघ मास के शुक्ल पक्ष व आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में। इस प्रकार कुल मिला कर वर्ष में चार नवरात्र होते हैं। यह चारों ही नवरात्र ऋतु परिवर्तन के समय मनाये जाते हैं। इस विशेष अवसर पर अपनी विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-पाठ आदि किये जाते हैं।
महत्त्व -
गुप्त नवरात्रों का बड़ा ही महत्त्व बताया गया है। मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधना काल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं। इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है। "दुर्गावरिवस्या" नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में भी माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। "शिवसंहिता" के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति माँ पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं।[1] गुप्त नवरात्रों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से कई बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं, जैसे-
विवाह बाधा -
वे कुमारी कन्याएँ जिनके विवाह में बाधा आ रही हो, उनके लिए गुप्त नवरात्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। कुमारी कन्याओं को अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इन नौ दिनों में माता कात्यायनी की पूजा-उपासना करनी चाहिए। "दुर्गास्तवनम्" जैसे प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि इस मंत्र का 108 बार जप करने से कुमारी कन्या का विवाह शीघ्र ही योग्य वर से संपन्न हो जाता है-
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरू ते नम:।।
इसी प्रकार जिन पुरुषों के विवाह में विलंब हो रहा हो, उन्हें भी लाल रंग के पुष्पों की माला देवी को चढ़ाकर निम्न मंत्र का 108 बार जप पूरे नौ दिन तक करने चाहिए-
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।
देवी की महिमा -
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना और जीवन शक्ति संसार में जहाँ कहीं भी दिखाई देती है, वहाँ देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। 'देवीभागवत' में लिखा है कि- "देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। जगन्माता दुर्गा सुकृती मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में अलक्ष्मी, विद्वानों-वैष्णवों के हृदय में बुद्धि व विद्या, सज्जनों में श्रद्धा व भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा एवं मर्यादा के रूप में निवास करती है। 'मार्कण्डेयपुराण' कहता है कि- "हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। भगवान विष्णु के हृदय में निवास करने वाली माँ लक्ष्मी-शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माँ तुम ही हो।"[1]
सरस्वती पूजा महोत्सव
माघी नवरात्र में पंचमी तिथि सर्वप्रमुख मानी जाती है। इसे 'श्रीपंचमी', 'वसंत पंचमी' और 'सरस्वती महोत्सव' के नाम से कहा जाता है। प्राचीन काल से आज तक इस दिन माता सरस्वती का पूजन-अर्चन किया जाता है। यह त्रिशक्ति में एक माता शारदा के आराधना के लिए विशिष्ट दिवस के रूप में शास्त्रों में वर्णित है। कई प्रामाणिक विद्वानों का यह भी मानना है कि जो छात्र पढ़ने में कमज़ोर हों या जिनकी पढ़ने में रुचि नहीं हो, ऐसे विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से माँ सरस्वती का पूजन करना चाहिए। देववाणी संस्कृत भाषा में निबद्ध शास्त्रीय ग्रंथों का दान संकल्प पूर्वक विद्वान ब्राह्मणों को देना चाहिए।
महानवमी को पूर्णाहुति -
गुप्त नवरात्र में संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए अष्टमी और नवमी तिथि को आवश्यक रूप से देवी के पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है। माता के संमुख "जोत दर्शन" एवं कन्या भोजन करवाना चाहिए।
स्त्री रूप में देवी पूजा -
'कूर्मपुराण' में पृथ्वी पर देवी के बिंब के रूप में स्त्री का पूरा जीवन नवदुर्गा की मूर्ति के रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री", कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" व विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से "चंद्रघंटा" कहलाती है। नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने से "कूष्मांडा" व संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कन्दमाता" होती है। संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" व पतिव्रता होने के कारण पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से "कालरात्रि" कहलाती है। संसार का उपकार करने से "महागौरी" व धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार को सिद्धि का आशीर्वाद देने वाली "सिद्धिदात्री" मानी जाती हैं।
घट स्थापना -
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर मिल जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, परंतु देवी की असली प्रतिमा "घट" है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दायीं ओर जौ व सामने हवनकुंड रखा जाता है। नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र व गंध आदि से षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। नैवेद्य में बताशे और नारियल तथा खीर का भोग होना चाहिए। पूजन और हवन के बाद "दुर्गास सप्तशती" का पाठ करना श्रेष्ठ है। साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने के लिए नवदुर्गा के प्रत्येक रूप की प्रतिदिन पूजा-स्तुति करनी चाहिए।
अन्य राज्यों में -
गुजरात में सभी हिन्दू त्योहार विक्रमी चांद्र वर्ष की तिथियों के अनुसार भारत के अन्य प्रदेशों की तरह मनाए जाते हैं और इस चांद्र वर्ष का आरंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना जाता है। किंतु लोहाना वंश के गुजरातियों के कुची, हलारी तथा ठक्कर गोत्र के लोग अपना नववर्ष 'आषाढ़ बीज' (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) को मनाते हैं। 'लोहाना समाज' अपना मूल स्थान लाहौर (पाकिस्तान) के समीपस्थ लोहाना नामक ग्राम बताते हैं। समूचे भारत में जहाँ नववर्ष का आरंभ चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना जाता है और उसी दिन से वासंतिक नवरात्र आरंभ हो जाते हैं; फिर भी सिन्धी समाज नववर्ष के आरंभ का बोधक 'चेटी चांद महोत्सव' चैत्र शुक्ला द्वितीया को मनाता है। विचित्र संयोग की बात है कि लोहाना समाज का नववर्ष भी द्वितीया तिथि को मनाया जाता है, भले ही महीना चैत्र के स्थान पर आषाढ़ हो। वस्तुत: यह 'आषाढ़ी गुप्त नवरात्र' का दूसरा दिन होता है। संयोग की बात है कि उड़ीसा प्रांत में स्थित जगन्नाथपुरी की रथयात्रा का उत्सव भी 'आषाढ़ी गुप्त नवरात्र' की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी या रासलीला वाली सहेली राधा के साथ नहीं, बल्कि अपने बड़े भाई बलराम तथा बहन सुभद्रा के साथ मूर्तिमान रहते हैं। इन तीनों की चल मूर्तियों को आषाढ़ द्वितीया वाली शोभा-यात्रा में अलग-अलग रथों पर सजाया जाता है। इन रथों का निर्माण कार्य प्रतिवर्ष 'अक्षय तृतीया' के शुभ दिन से ही आरंभ होता है, जबकि उस दिन वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश वाले 'बांके बिहारी मंदिर' में स्थापित भगवान कृष्ण की मूर्ति को चंदन का लेप करके सजाया जाता है। उन दोनों भाइयों समेत सुभद्रा की पूजा वहीं पर होती है।
महाराष्ट्र के 'वारकरी संप्रदाय' के श्रद्धालुगण भगवान श्रीकृष्ण को 'विट्ठलनाथ', 'विठोबा' अथवा 'प्रभु पुण्डरीक' पुकारते हैं। महाराष्ट्र के पुणे के पंढरपुर नामक स्थान पर विट्ठलनाथ का प्राचीनतम मंदिर है, जिसकी यात्रा आषाढ़ माह की एकादशी अर्थात् 'देवशयनी एकादशी' से आरंभ हो जाती है। जनश्रुति है कि विट्ठलनाथ जी अपनी पटरानी रुक्मिणी जी को बताए बिना गुप्त रूप में पंढरपुर चले आए थे। वे उन्हें ढ़ूंढ़ती हुई पंढरपुर पहुंच गई थीं। अत: विट्ठलनाथ जी की मूर्ति के साथ मंदिर में रुक्मिणी जी भी विद्यमान रहती हैं।
बंगाल में आषाढ़ की शुक्ल पक्ष द्वितीया को 'मनोरथ द्वितीया व्रत' कहा जाता है। उस दिन स्त्रियाँ दुर्गा से अपनी मनोकामनाएँ पूर्ति हेतु व्रत रखती हैं। आषाढ़ शुक्ल षष्ठी को बंगाल में 'कर्दम षष्ठी', 'कुसुंभा षष्ठी' तथा 'स्कन्द षष्ठी' भी कहा जाता है। उस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के छोटे पुत्र स्कंद और उनकी पत्नी षष्ठी देवी की पूजा की जाती है। आषाढ़ माह की शुक्ल सप्तमी को भारत के पूर्वी भाग में सूर्य की पूजा का उत्सव मनाया जाता है। आषाढ़ शुक्ल अष्टमी को त्रिपुरा में खरसी-पूजा उत्सव मनाया जाता है। तत्संबंधी प्रसिद्ध मेला खवेरपुर नामक कस्बे में मनाया जाता है, जिसमें अधिकतर सन्न्यासी ही भाग लेते हैं। सन्न्यास धारिणी स्त्रियाँ तंबाकू से भरी हुई चिलम में कश लगाकर, धुआँ छोड़कर लोगों को आश्चर्यचकित कर देती हैं।
तमिलनाडु में आषाढ़ मास की अष्टमी को मनाए जाने वाले महोत्सव को 'अदिपुरम' कहा जाता है। आषाढ़ मास को तमिल भाषा में 'अदि' और 'पर्व' को 'पुरम' कहा जाता है। उस दिन लोग अपने परिवार की सुख-शांति हेतु शक्ति-देवी की पूजा करते हैं।
<3 आषाढ़ शुक्ल नवमी गुप्त नवरात्र का अंतिम दिन होता है। उस दिन भारत के कश्मीर के भवानी मंदिर में विशाल मेला लगता है। उसी दिन 'हरि जयंती' के कारण वैष्णव भक्त व्रत भी रखते हैं और वैष्णव मंदिरों में मनोकामनाओं की पूर्ति और दर्शनार्थ जाते हैं। उसी दिन 'भडल्या नवमीं' पर व्रतधारिणी स्त्रियाँ भी घर में अथवा देवी-मंदिर में पूजा करती हैं।[
गुप्त नवरात्र में दशमहाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए। उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी। इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने के लिए गुप्त नवरात्रों में साधना की थी। शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था कि गुप्त नवरात्रों में अपनी कुलदेवी निकुम्बाला की साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है…
आषाढ़ और माघ माह के नवरात्रों को ‘गुप्त नवरात्र’ कहा जाता है। इसका ज्ञान बहुत ही सजग शक्ति उपासकों तक सीमित रहता है, इसीलिए इसे ‘गुप्त नवरात्र’ कहा जाता है। गुप्त नवरात्र का माहात्म्य और साधना का विधान ‘देवी भागवत’ व अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। गुप्त नवरात्र भी ‘शारदीय’ और ‘वासंतिक’ नवरात्रों की तरह फलदायी होते हैं। श्रृंगी ऋ षि ने गुप्त नवरात्रों के महत्त्व को बताते हुए कहा है कि ‘जिस प्रकार वासंतिक नवरात्र में भगवान विष्णु की पूजा और शारदीय नवरात्र में मां शक्ति की नौ विग्रहों की पूजा की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रों से एक प्राचीन कथा जुड़ी हुई है। एक समय ऋषि श्रृंगी भक्त जनों को दर्शन दे रहे थे। अचानक भीड़ से एक स्त्री निकल कर आई,और करबद्ध होकर ऋषि श्रृंगी से बोली कि मेरे पति दुर्व्यसनों से सदा घिरे रहते हैं,जिस कारण मैं कोई पूजा-पाठ नहीं कर पाती। धर्म और भक्ति से जुड़े पवित्र कार्यों का संपादन भी नहीं कर पाती। यहां तक कि ऋषियों को उनके हिस्से का अन्न भी समर्पित नहीं कर पाती। मेरा पति मांसाहारी हैं,जुआरी है,लेकिन मैं मां दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूं,उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूं। ऋषि श्रृंगी महिला के भक्तिभाव से बहुत प्रभावित हुए। ऋषि ने उस स्त्री को आदरपूर्वक उपाय बताते हुए कहा कि वासंतिक और शारदीय नवरात्रों से तो आम जनमानस परिचित है लेकिन इसके अतिरिक्त दो नवरात्र और भी होते हैं, जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है। प्रकट नवरात्रों में नौ देवियों की उपासना हाती है और गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वैश्वर्यकारिणी देवी है। यदि इन गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा साधना करता है तो मां उसके जीवन को सफल कर देती हैं। लोभी, कामी, व्यसनी, मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि गुप्त नवरात्रों में माता की पूजा करता है तो उसे जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। उस स्त्री ने ऋ षि श्रृंगी के वचनों पर पूर्ण श्रद्धा करते हुए गुप्त नवरात्र की पूजा की। मां प्रसन्न हुई और उसके जीवन में परिवर्तन आने लगा, घर में सुख शांति आ गई। पति सन्मार्ग पर आ गया,और जीवन माता की कृपा से खिल उठा।
यदि आप भी एक या कई तरह के दुर्व्यसनों से ग्रस्त हैं और आपकी इच्छा है कि माता की कृपा से जीवन में सुख समृद्धि आए तो गुप्त नवरात्र की साधना अवश्य करें। तंत्र और शाक्त मतावलंबी साधना के दृष्टि से गुप्त नवरात्रों के कालखंड को बहुत सिद्धिदायी मानते हैं। मां वैष्णो देवी, पराम्बा देवी और कामाख्या देवी का का अहम् पर्व माना जाता है। पाकिस्तान स्थित हिंगलाज देवी की सिद्धि के लिए भी इस समय को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए ऋषि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ ने बहुत प्रयास किए लेकिन उनके हाथ सिद्धि नहीं लगी। वृहद काल गणना और ध्यान की स्थिति में उन्हें यह ज्ञान हुआ कि केवल गुप्त नवरात्रों में शक्ति के इन स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है। गुप्त नवरात्रों में दशमहाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए। उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी। इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने के लिए गुप्त नवरात्र में साधना की थी। शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था कि गुप्त नवरात्रों में अपनी कुल देवी निकुम्बाला कि साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है। मेघनाद ने ऐसा ही किया और शक्तियां हासिल की।
राम, रावण युद्ध के समय केवल मेघनाद ने ही भगवान राम सहित लक्ष्मण जी को नागपाश मे बांध कर मृत्यु के द्वार तक पहुंचा दिया था। ऐसी मान्यता है कि यदि नास्तिक भी परिहासवश इस समय मंत्र साधना कर ले तो उसका भी फल सफलता के रूप में अवश्य ही मिलता है। यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है। यदि आप मंत्र साधना, शक्ति साधना करना चाहते हैं और काम-काज की उलझनों के कारण साधना के नियमों का पालन नहीं कर पाते तो यह समय आपके लिए माता की कृपा ले कर आता है।गुप्त नवरात्रों में साधना के लिए आवश्यक न्यूनतम नियमों का पालन करते हुए मां शक्ति की मंत्र साधना कीजिए। गुप्त नवरात्र की साधना सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। गुप्त नवरात्र के बारे में यह कहा जाता है कि इस कालखंड में की गई साधना निश्चित ही फलवती होती है। हां, इस समय की जाने वाली साधना की गुप्त बनाए रखना बहुत आवश्यक है। अपना मंत्र और देवी का स्वरुप गुप्त बनाए रखें। गुप्त नवरात्र में शक्ति साधना का संपादन आसानी से घर में ही किया जा सकता है। इस महाविद्याओं की साधना के लिए यह सबसे अच्छा समय होता है।
गुप्त व चामत्कारिक शक्तियां प्राप्त करने का यह श्रेष्ठ अवसर होता है। धार्मिक दृष्टि से हम सभी जानते हैं कि नवरात्र देवी स्मरण से शक्ति साधना की शुभ घड़ी है। दरअसल, इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इस बदलाव से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण में रोगाणु। जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं। सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है। नवरात्र के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं। जिससे इंसान निरोगी होकर लंबी आयु और सुख प्राप्त करता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार गुप्त नवरात्र में प्रमुख रूप से भगवान शंकर व देवी शक्ति की आराधना की जाती है। देवी दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप है। दुर्गा शक्ति में दमन का भाव भी जुड़ा है। यह दमन या अंत होता है शत्रु रूपी दुर्गुण, दुर्जनता, दोष, रोग या विकारों का। ये सभी जीवन में अड़चनें पैदा कर सुख-चैन छीन लेते हैं। यही कारण है कि देवी दुर्गा के कुछ खास और शक्तिशाली मंत्रों का देवी उपासना के विशेष काल में जाप शत्रु, रोग, दरिद्रता रूपी भय बाधा का नाश करने वाला माना गया है। सभी’नवरात्र’ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक किए जाने वाले पूजन, जाप और उपवास का प्रतीक है- ‘नव शक्ति समायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते’। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं। नवरात्र के नौ दिनों तक समूचा परिवेश श्रद्धा व भक्ति, संगीत के रंग से सराबोर हो उठता है। धार्मिक आस्था के साथ नवरात्र भक्तों को एकता, सौहार्द, भाईचारे के सूत्र में बांधकर उनमें सद्भावना पैदा करता है।
महत्त्व
शाक्त ग्रंथो में गुप्त नवरात्रों का बड़ा ही माहात्म्य गाया गया है। मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधनाकाल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं। इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ‘दुर्गावरिवस्या’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। ‘शिवसंहिता’ के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति मां पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं। गुप्त नवरात्रों के साधनाकाल में मां शक्ति का जप, तप, ध्यान करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं नष्ट होने लगती हैं।
गुप्त नवरात्रि कब होती हैं
तथा इस में क्या साधना होती है
और साधना की मुख्य सिद्ध पीठ कोन से हैं !!
हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती, इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं इस गुप्त नवरात्रि में वामाचार पद्धति से उपासना की जाती है। यह समय शाक्य एवं शैव धर्मावलंबियों के लिए पैशाचिक, वामाचारी क्रियाओं के लिए अधिक शुभ एवं उपयुक्त होता है। इसमें प्रलय एवं संहार के देवता महाकाल एवं महाकाली की पूजा की जाती है। साथ ही संहारकर्ता देवी-देवताओं के गणों एवं गणिकाओं अर्थात भूत-प्रेत, पिशाच, बैताल, डाकिनी, शाकिनी, खण्डगी, शूलनी, शववाहनी, शवरूढ़ा आदि की साधना भी की जाती है। यह साधनाएं बहुत ही गुप्त स्थान पर या किसी सिद्ध श्मशान में की जाती हैं। दुनिया में सिर्फ चार श्मशान घाट ही ऐसे हैं जहां तंत्र क्रियाओं का परिणाम बहुत जल्दी मिलता है। ये हैं तारापीठ का श्मशान (पश्चिम बंगाल), कामाख्या पीठ (असम) का श्मशान, त्रयंबकेश्वर (नासिक) और उज्जैन स्थित चक्रतीर्थ श्मशान। गुप्त नवरात्रि में यहां दूर-दूर से साधक गुप्त साधनाएं करने यहां आते हैं।
साधना की मुख्य सिद्ध पीठ
तारापीठ- यह मंदिर पश्चिम बंगाल के वीर भूमि जिले में एक छोटा शहर है। यहां तारा देवी का मंदिर है। इस मंदिर में मां काली का एक रूप तारा मां की प्रतिमा स्थापित है। रामपुर हाट से तारापीठ की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। इसलिए इस स्थान को नयन तारा भी कहा जाता है। तारापीठ मंदिर का प्रांगण श्मशान घाट के निकट स्थित है, इसे महाश्मशान घाट के नाम से जाना जाता है। इस महाश्मशान घाट में जलने वाली चिता की अग्नि कभी बुझती नहीं है। यहां आने पर लोगों को किसी प्रकार का भय नहीं लगता है। मंदिर के चारों ओर द्वारका नदी बहती है। इस श्मशान में दूर-दूर से साधक साधनाएं करने आते हैं।
कामाख्या पीठ- असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से 8 किलोमीटर दूर कामाख्या मंदिर है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है व इसका तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है।
पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम राज्य की राजधानी दिसपुर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलांचल अथवा नीलशैल पर्वतमालाओं पर स्थित मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है। यह स्थान तांत्रिकों के लिए स्वर्ग के समान है। यहां स्थित श्मशान में भारत के विभिन्न स्थानों से तांत्रिक तंत्र सिद्धि प्राप्त करने आते हैं।
नासिक- त्रयंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मन्दिर महाराष्ट्र के नासिक जिले में है। यहां के ब्रह्म गिरि पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम है। मंदिर के अंदर एक छोटे से गड्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। ब्रह्मगिरि पर्वत के ऊपर जाने के लिये सात सौ सीढिय़ां बनी हुई हैं।
इन सीढिय़ों पर चढऩे के बाद रामकुण्ड और लक्ष्मण कुण्ड मिलते हैं और शिखर के ऊपर पहुँचने पर गोमुख से निकलती हुई भगवती गोदावरी के दर्शन होते हैं। भगवान शिव को तंत्र शास्त्र का देवता माना जाता है। तंत्र और अघोरवाद के जन्मदाता भगवान शिव ही हैं। यहां स्थित श्मशान भी तंत्र क्रिया के लिए प्रसिद्ध है।
उज्जैन- महाकालेश्वर मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी माना जाता है। इस कारण तंत्र शास्त्र में भी शिव के इस शहर को बहुत जल्दी फल देने वाला माना गया है। यहां के श्मशान में दूर-दूर से साधक तंत्र क्रिया करने आते हैं। उज्जैन स्थित श्मशान को चक्रतीर्थ कहते हैं।
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Bagalamukhi / Baglamukhi Vashikaran
« Last post by admin on May 23, 2016, 03:06:45 PM »
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Baglamukhi Devi
 
 
Baglamukhi Devi is one of the important goddess who is worshiped to remove one from delusions and misconceptions of life, the important temple of the goddess is found in Assam just at a distance of few kilometers than the Kamakhya temple which is famous for most tantric rituals. People of north India also know the Devi by the name of Pitambaramaa, people from all around the country visit the temple to perform rituals and seek blessings. Those who are by any reason are not facing good results in their life must visit the goddess and all their problems will resolved but you must have complete faith in the divinity of the goddess.
 
 
 
 
What is Baglamukhi Vashikaran?
 
 
Vashikaran is a very powerful method to attain what we desire in our life, it is a method devised long ago to help the mankind to achieve the impossible. Our ancestors long ago, with help of our Vedas availed us with lots of mantras and puja’s that can help us resolve our issues and gain special blessings from the deity.
 
 
Now let us not mistake the vashikaran with the black magic, as black magic is something that is done by the negative powers to harm anybody, these sort of powers are not advised by our ancestors and our Vedas, even such services cannot be associated with the gods and goddesses of Hindu mythology as anything negative cannot provide you positive results while vashikaran is a form of blessings you get with the enchantment of powerful mantras associated with the deity. It is a positive method to help the mankind in their relationships, career, and personal life and in many other factors.
 
 
Benefits of Baglamukhi Vashikaran
 
 
Makes you invincible in any part of life.
 
Provides protection against your enemies.
 
If you are under any Law suit, then you will be benefited.
 
If you are facing any property related issues, then your problem will be resolved.
 
If you are under the effect of any sort of black magic, magical spells of negativity, or any powerful occult practiced on you than you will be exempted of it with immediate effect.
 
Attracts wealth in your life from all corners, riches will flow to your path like water flows from an elevation to depression and by depression we mean ground not the other way.
 
All sort of prosperity and abundance finds its mark and will fill your path with it.
 
Protection of you and of your family members is guaranteed from anything that can cause you and them any sort of harm.
 
A circle of positivity follows you everywhere and all sort negative people, their intensions and thoughts full of jealousy are deflected away before they reach you.
 
Fame is observed in the life of those who seek it and belong to the fields of glamor and politics
 
Success becomes your life long partner; wherever you go you are perceived as the person of achievements.
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Useful Information and Quotes / Remove Navagraha Dosha by Changing you habits
« Last post by admin on May 05, 2016, 09:55:06 PM »
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{}♥ज्योतिष को अपनाओ। पर कुछ आदतों से,
नवग्रहो का सम्मान कर सुधारें, अपना घर व जीवन{}
◆◆◆◆¤◆◆◆◆◆◆¤◆◆◆◆◆◆◆¤◆◆◆◆◆¤◆◆◆◆
☆अगर आपको कहीं पर भी थूकने की आदत है तो यह निश्चित है, कि आपको यश, सम्मान अगर मुश्किल से मिल भी जाता है तो कभी टिकेगा ही
नहीं, wash basin में ही यह काम कर आया करें। यश, मान-सम्मान में अभिवृध्दि होगी।
☆जिन लोगों को अपनी जूठी थाली या बर्तन वहीं उसी जगह पर छोड़ने की आदत होती है, उनको सफलता कभी भी स्थायी रूप से नहीं मिलती।
बहुत मेहनत करनी पड़ती है, और ऐसे लोग अच्छा नाम नहीं कमा पाते, अगर आप अपने जूठे बर्तनों को उठाकर उनकी सही जगह पर रख आते हैं तो, चन्द्रमा और शनि का आप सम्मान करते हैं। इससे मानसिक शांति बढ़ कर अड़चनें दूर होती हैं।
☆जब भी हमारे घर पर कोई भी बाहर से आये, चाहे मेहमान हो या कोई काम करने वाला, उसे स्वच्छ पानी ज़रुर पिलाएं। ऐसा करने से हम राहु का सम्मान करते हैं।
■जो लोग बाहर से आने वाले लोगों को हमेशा स्वच्छ पानी पिलाते हैं, उनके घर में कभी भी राहु का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, अचानक आ पड़ने वाले कष्ट-संकट नहीं आते।
☆घर के पौधे आपके अपने परिवार के सदस्यों जैसे ही होते हैं, उन्हें भी प्यार और थोड़ी देखभाल की जरुरत होती है। जिस घर में सुबह-शाम पौधों को पानी दिया जाता है तो हम बुध, सूर्य और चन्द्रमा का सम्मान करते हुए परेशानियों का डटकर सामना कर पाने का सामर्थ्य आ पाता है, परेशानियां दूर होकर सुकून आता है।
☆जो लोग नियमित रूप से पौधों को पानी देते हैं, उन लोगों को depression, anxiety जैसी परेशानियाँ नहीं पकड़ पाती।
☆जो लोग बाहर से आकर अपने चप्पल, जूते, मोज़े इधर-उधर फैंक देते हैं, उन्हें उनके शत्रु बड़ा परेशान करते हैं। इससे बचने के लिए अपने चप्पल-जूते करीने से लगाकर रखें, आपकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी।
☆उन लोगों का राहु और शनि खराब होगा, जो लोग जब भी अपना बिस्तर छोड़ेंगे तो उनका बिस्तर हमेशा फैला हुआ होगा, सिलवटें ज्यादा होंगी, चादर कहीं, तकिया कहीं, कम्बल कहीं?
■उस पर ऐसे लोग अपने पुराने पहने हुए कपडे़ तक फैला कर रखते हैं, ऐसे लोगों की पूरी दिनचर्या कभी भी व्यवस्थित नहीं रहती, जिसकी वजह से वे खुद भी परेशान रहते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं।
इससे बचने के लिए उठते ही स्वयं अपना बिस्तर समेट दें। जीवन आश्चर्यजनक रूप से सुंदर होता चला जायेगा।
☆पैरों की सफाई पर हम लोगों को हर वक्त ख़ास ध्यान देना चाहिए, जो कि हम में से बहुत सारे लोग भूल जाते हैं। नहाते समय अपने पैरों को अच्छी तरह से धोयें, कभी भी बाहर से आयें तो पांच मिनट रुक कर मुँह और पैर धोयें।
■आप खुद यह पाएंगे कि आपका चिड़चिड़ापन कम होगा, दिमाग की शक्ति बढे़गी और क्रोध धीरे-धीरे कम होने लगेगा, तब जीवन मे आनंद बढ़ेगा।
☆रोज़ खाली हाथ घर लौटने पर धीरे-धीरे उस घर से लक्ष्मी चली जाती है और उस घर के सदस्यों में नकारात्मक या निराशा के भाव आने लगते हैं।
■इसके विपरीत घर लौटते समय कुछ न कुछ वस्तु लेकर आएं तो उससे घर में बरकत बनी रहती है.!
उस घर में लक्ष्मी का वास होता जाता है। हर रोज घर में कुछ न कुछ लेकर आना वृद्धि का सूचक माना गया है। ऐसे घर में सुख, समृद्धि और धन हमेशा बढ़ता जाता है और घर में रहने वाले सदस्यों की भी तरक्की होती है।
♥जूठन बिल्कुल न छोड़ें, ठान लें, एक दम तय कर लें, इससे पैसों की कभी कमी नहीं होगी। अन्यथा नौ के नौ गृहों के खराब होने का खतरा सदैव मंडराता रहेगा। कभी कुछ कभी कुछ, करने के काम पड़े रह जायेंगे और समय व पैसा कहां जायेगा पता ही नहीं चलेगा।
☆अच्छी बातें बाँटने से दोगुनी तो होती ही हैं। अच्छी बातों का महत्त्व समझने वालों में आपकी इज़्जत भी बढ़ती है।
अपनाये वह जीवन भर लाभ उठायें।
जय शिव।
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